खानदाने आला हजरत

आला हजरत 14वीं सदी के मुजद्दीद, इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी قدس سرہٗ की जीवनी और आपके दिनी ,और समाजिक कारनामों की जानकारीरी हासिल करने के लिए ‌ पहले आला हजरत के खानदान के हालात का पता लगाते हैं । इसी के तहत आज का यह आर्टिकल हम लिख रहे हैं खानदाने आला हजरत के विषय पर।।।

खानदाने आला हजरत

आला हजरत के सबसे बड़े दादा जो सबसे पहले भारत आए वह शहजादासईदुल्लाह खां वली अहद रियासते कंधार( अफगानिस्तान ) हैं।. आला हजरत के दादा सईदुल्लाह भारत के शहर लाहौर जोो कि अब पाकिस्तान मेंं है आकर बसे।

हजरत का शजरा नसाब वंशवाद कुछ इस प्रकार हैं।

आला हजरत इमाम अहमद रजा खां पिता मुफ्ती नकी अली खां,पिता रजा अली खां। पिता हाफिज काजिम अली खां। पिता मोहम्मद आजम खां। पिता साआदत यार खां। पिता सईदुल्लाह खां (शुजा अत ज॔ग)।

आला हजरत के दादा सईदुल्लाह खां को मुगल हुकूमत की तरफ से लाहौर में शीश महल दिया गया और शश हजारी मनसब भी आता हुआ था।

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रोज़े की बरकत

और जब आला हजरत के दादा सईदुल्लाह खां लाहौर से दिल्ली आए तो यहां दिल्ली में आपको “शुजाते जंग ” شجاعت جنگ का खिताबताब मिला।

और जब रुहेलखंड में बगावत होने लगा तो बागियों को अंजाम तक पहुंचानेेे के लिए हुकूमत मुगलिया कि तरफ से सईदुल्लाह खां को जिम्मेदारी सौंपी गई। और जब रुहेलखंड की। बगावत को कुचला दिया तो । हुकूमत की ओर से सईदुल्लाह खां बरेली में रहने का आदेश मिला….

और आला हजरत के दादा सईदुल्लाह खां को राज्यपाल گورنر बनाया गया और आप को एक जागीर दी गई थी जिसका बहुत बड़ा और मशहूर मुकाम धनेली था जो जिला रामपुर में है।

जब सईदुल्लाह खां बुढ़ापे की वजह से नौकरी छोड़ दी आखिरी उम्र में अल्लाह की याद में गुजारी जिस मैदान में आप यादें इलाही के लिए ठहरे थे उसी जगह आप का इंतकाल हुआ बाद में मुसलमानों ने उस जगह मैं को कब्रिस्तान बना दिया आपकी वजह से ही उस कब्रिस्तान का नाम आज तक शहजादे का तकिया कहलाता है…

सईदुल्लाह खां कि जिंदगी मेंं ही उनके लड़के साआ दत यार खां दिल्ली हुकूमत की वजीर( वित्त मंत्री) खजाना हो चुकेे थे। आप बहुत इज्जत के साथ इस वादे पर कायम रहेेेे और पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी केेेेेेे साथ अपनी जिम्मेदारी को निभाते रह और अपना मकाम ऊंचा किय। दिल्ली में आप मंत्री दो 2 अनमोल काम किए। जो आपकी यादगार है एक बाजार सा दत्त गंज दूसरी सादात खान नहर,…

सा आदत खान के बेटे मोहम्मद आजम को भी हुकुमति मुगलिया की तरफ से बड़े और आला पोस्ट मिले मगर प के दिल में यह सब नही

आप जिस वक्त तकिया मेंमारान में दुनिया छोड़ कर बैठे थे उसी समय की बात है कि आपके बेटे हाफिज काजिम अली खां शहर बदायूं के तहसीलदार थे उस जमाने में तहसीलदार आज के जमाने के डीएम के बराबर था, हाफिज साहब अपने पिता से मुलाकात के लिए हर बृहस्पतिवार جمعرات को यहां आते अपने पिता के लिए अच्छे से अच्छे उपहार गिफ्ट Gift लाते और जाते वक्त पैसे दे जाते ।


एक बार जब हाफिज काजिम अली खां अपने पिता से मिलने आए तो जाड़े का सीजन था। लोग जाड़े से कांप रहे आपके पिताजी के बदन पर कोई कपड़ा नहीं था । हाफिज साहब ने कीमती चादर उतार कर अपने पिताजी को उड़हा दी आपके पिता ने उसको उतार कर आग में डाल दिया । हाफिज साहब अपने दिल में सोचने लगे यह तो कीमती चादर थी उसको बर्बाद कर दिया अगर आप नहीं लेते तो ठीक था किसी गरीब को दे देते उस बेचारे का भला होता।

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जब हाफिज काजिम अली खां के दिल में यह बात आई तो हजरत मोहम्मद आजम खान ने आग के शोले में हाथ डालकर वह चादर खींच ली और फरमाया काजिम बेटे ले अपनी चादर फकीर के यहां धक्कर फक्कर का काम नहीं , जब देखा तो चादर बिल्कुल ठीक-ठाक थी आग ने उस पर कुछ भी अपना काम नहीं किया था।


जैसा कि आपने पढ़ा हजरत हाािज काजिमम अली खान बदायूं के डीएम थे 200 की बटालियन हमेशा आपकी खिदमत में रहती थी 8 गांव जागीर माफी में मिले थे आजाद भारत के बाद 1954 तक आपके खानदान में यह सब रहा। 1954 में जब कांग्रेस ने जायदादें जबत की तो यह भी गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने जबत कर लिया ….

आला हजरत के बारे में जानकारी प्राप्त करें


हजरत हाफिज काजिम अली खान हजरत मौलाना अनवारुल हक फरंगी महली रहमतुल्ला अलैह से मुरीद थे। हजरत मौलाना अनवारुल हक फरंगी महली हजरत सैयदना शाह आले रसूल आमदी मारहरवी रहमतुल्लाह अलैह के उस्ताद थे।।।


हजरत हाफिज काजिम अली खां के दो बेटे थे एक का नाम मौलाना रज़ा अली खां दूसरे का नाम हकीम तकी अली खां…
हकीम तकी अली खां फनने तिब Doctor में महारत हासिल की और रियासत जयपुर में तबी बे खास हुए Doctor में Famous हुए ।।।।

हजरत मौलाना रज़ा अली खां

हजरत मौलाना रजा अली खां जो हाला हजरत के अपने दादा हैं आपका जन्म 1809 इसवी 1324 हिजरी में हुई. राजस्थान के शहर टुंक ٹونکमें मौलवी खलीलुर रहमान मरहूम साहब से ईल्म हासिल करके 22 साल की उम्र में आलीमेदीन बन गए। ۔۔۔

आलिम बनने के बाद फतवा लिखना शुरू किया और आसपास के शहरों में मशहूर हो गए हजरत मौलाना रजा अली खान आला हजरत के दादा बहुत बड़े करामत वाले बुजुर्ग थे , इस खानदान में आप ही ने दौलत ए इल्म दीन लाए तो उस खानदान के हाथ से तलवार छोटी और तलवार की जगह कलम ने ले ली,

अब इस खानदान का रुख मुल्क की हिफाजत से दिन की हिमायत की तरफ हो गया।
आपने ही अरबी जबान में जुम्मा और ईद बकरीद के लिए खुद में लिखे जो बाद में आपने अपने शिशु शागिर्द मौलवी मोहम्मद हसन अली حسن दे दिए और उन्होंने उर्दू के कुछ शेर लिखकर उसमें ज्यादा किए और उसे छाप दिया। जो आज खुद बाय इल्मी خطبہ علمی के नाम से मशहूर है और पूरे देश में जुमा ईद में इमाम लोग पढ़ते हैं।।


हजरत मौलाना रजा अली खान साहब शेेेेखुल मशाईखई شیخ المشائخहजरत मौलाना फजलुर रहमान गंज मुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह فضل الرحمن گنج सेद थे जो सिलसिले मुजद दिदया नक्शबंदी या के बहुत बड़े बुजुर्ग आली मे दिन हदीस के जानकार हजरत मौलाना शाह अब्दुल अजीज मुहददिसे देहलवी केعبد العزیز محدث دہلوی बहुत सच्चे और ईमानदार शिशु शागिर्द थे।।।।

करामात

1857 के गदर के बाद जब अंग्रेज बरेली में कब्जा कर लिए तो मुसलमानों पर जुल्म करने लगे लोग डर के मारे परेशान फिरते थे जमींदार लोग अपने मकान घर बार छोड़कर गांव चले गए, लेकिन आप मोहल्ला जखीरा जसोली बरेली में अपने मकान पर ही रहते थे .

और पांच वक्त की नमाज मस्जिद में पढ़ा करते थे एक दिन आप मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे कि अंग्रेजों का उधर से जाना हुआ , अंग्रेजों ने सोचा कि कोई मुसलमान मस्जिद में जरूर होगा, चलो उसको पकड़ कर मारते हैं अंग्रेज जब अंदर आए पूरी मस्जिद देखिए कहीं कोई शख्स नजर ना आया , हालांकि आप मस्जिद में मौजूद थे अल्लाह ताला ने उन सब अंग्रेजों को आपकी मदद के लिए अंधा कर दिया था….

हजरत मौलाना रजा रजा अली खान एक बेहतरीन बकता speaker मुकर्रर थे आपकी बातों से लोग काफी मुतासिर होते थे , किसी से बातें करते तो बहुत सादा ,और धिमी अंदाज में बात करते सलाम सबसे पहले करते , थोड़े से खाने पर सब्र करते, छोटू से प्यार ,और बड़ों से अदब से बात करते ,ईल्म कुर आन में आपको पूरा कमाल था, दिन के मसाइल जानने में आप बहुत ही माहिर थे।

हजरत मौलाना रजा अली खान आला हजरत के दादा अरबी महिने जमादिल ओला की दो तारीख, 1283 हिजरी को इंतकाल हुए, सिटी कब्रिस्तान बरेली शरीफ में आप का मजार है

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